گلهای تازه ۱۰۷
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گوینده: رضا معینی |
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دوش با من گفت پنهان کاردانی تیزهوش |
وز شما پنهان نشاید داشت راز می فروش |
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گفت آسانگیر بر خود کارها کز روی طبع |
سخت میگیرد جهان بر مردمان سختکوش |
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وانگهم در داد جامی کز فروغش بر فلک |
زُهره در رقص آمد و بربط زنان میگفت نوش |
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حافظ (غزل) |
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گوینده: رضا معینی |
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گوش کن پند ای پسر وز بهر دنیا غم مخور |
گفتمت چون دُر حدیثی گر توانی داشت گوش |
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با دل خونین لب خندان بیاور همچو جام |
نی گرت زخمی رسد آیی چو چنگ اندر خروش |
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حافظ (غزل) |
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آواز: شجریان |
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من همان نایم که گر خوش بشنوی |
شرح دردم با تو گوید مثنوی |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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گوینده: رضا معینی |
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من همان نایم که گر خوش بشنوی |
شرح دردم با تو گوید مثنوی |
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یک نفس در دم، هزار آواز بین |
روح را شیدایی پرواز بین |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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آواز: شجریان |
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من همان جامم که گفت آن غمگسار |
با دل خونین لب خندان بیار |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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گوینده: رضا معینی |
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من همان جامم که گفت آن غمگسار |
با دل خونین لب خندان بیار |
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من خَمُش کردم خروش چنگ را |
گرچه صد زخم است این دلتنگ را |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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آواز: شجریان |
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من همان عشقم که در فرهاد بود |
او نمیدانست و خود را میستود |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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گوینده: رضا معینی |
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من همان عشقم که در فرهاد بود |
او نمیدانست و خود را میستود |
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من همیکَندم نه تیشه کوه را |
عشق، شیرین میکند اندوه را |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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آواز: شجریان |
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در رُخ لیلی نمودم خویش را |
سوختم مجنون خاماندیش را |
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میگرستم در دلش با دردِ دوست |
او گمان میکرد اشکِ چشم اوست |
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گوینده: رضا معینی |
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در رُخ لیلی نمودم خویش را |
سوختم مجنون خاماندیش را |
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میگرستم در دلش با دردِ دوست |
او گمان میکرد اشکِ چشم اوست |
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هوشنگ ابتهاج (مثنوی) |
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تصنیف: شجریان |
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افتخار همه آفاقی و منظور منی، تو منظور منی |
شمع جمع همه عشّاق و به هر انجمنی |
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به سر زلف پریشان تو دلهای پریش |
همه خو کرده چو عارف به پریشان سخنی |
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ز چه رو شیشۀ دل میشکنی |
تیشه بر ریشۀ جان از چه زنی |
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سیم اندام و ولی سنگدلی |
سست پیمانی و پیمانشکنی، تو پیمانشکنی |
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اگر درد من به درمان رسد چه میشه |
شب هجر اگر به پایان رسد چه میشه |
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گر بار غم به منزل رسد چه گردد |
سر من اگر به سامان رسد چه میشه |
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ز غمت خون میگریم |
بنگر چون میگریم |
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ز مژه دل میریزد |
ز جگر خون میآید |
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افتخار دل و جان میآید |
یار بیپرده عیان میآید |
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عارف قزوینی (غزل)
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